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Monday, October 18, 2010

जिंदगी

जैसे तैसे ही चलती है
मैंने देखा है इसे

वश में नहीं यह जीने वाले के
थोड़ा तुम्हारे थोड़ा जग के
बाकी ऊपरवाले के हाथ में खेलती है
मैंने देखा है इसे

अनजाना रहस्य है
कभी नवयौवना के खुले लहराते केश से
खिले निर्द्वंद स्वच्छंद
कभी असूझ अबूझ पहेली
मैंने देखा है इसे

फिर भी सुख है आनंद है
जीने में इसके साथ
स्वार्थ भी है
कि समय हाथ से सरक न जाय
प्रभु ने बहुत थोड़ा दिया है जीने को
जिंदगी ।
........अरुण
१८ अक्तूबर २०१०

Sunday, February 14, 2010

चरैवेति
जिंदगी
इतनी लम्बी जिंदगी
इसे क्षणभंगुर कैसे कहते हो
तिल तिल सरकती जिंदगी
ऊपर नीचे फिसलती जिंदगी
कभी तैरती कभी छलांग लगाती जिंदगी
क़दमों तले झुकती काल चक्र में पिसती
भूख से कसमसाती दर्द से कराहती
मृत्यु आने तक प्रतीक्षा करती
जीती !
लम्बी जिंदगी
क्षणभंगुर कैसे हो सकती है !
जीने की कला नहीं आती
जिंदगी से ही शिकायत हो गयी!
यह हो गयी क्षणभंगुर
और संसार माया हो गयी!
माया से निकलोगे?
मया जाल तोड़ कर भागोगे?
भागो कितना भागोगे
उलझते जाओगे!
क्योंकि यही सत्य है !
माया-जाल जाल नहीं
शाश्वत सत्य है !
यह है - तो - हम हैं
हम हैं तो धर्म है
हम हैं तो ईश्वर है
हम हैं तभी पूरा ब्रह्माण्ड है
नहीं तो
कौन देखेगा सोचेगा बतायेगा ?
कि धर्म क्या ईश्वर क्या ब्रह्माण्ड क्या !
ईश्वर हमारा - ऋणी है - हम उसके
दोनों सत्य है
जिंदगी लम्बी है आओ जीना शुरू करें !!!
..............................अरुण 
(मंगलवार, २९ नवम्बर , २००५ )