Showing posts with label mera bharat mahan. Show all posts
Showing posts with label mera bharat mahan. Show all posts

Thursday, April 7, 2011

तंत्र

पहले राजा (हुआ करते) थे 
अब है लोकतंत्र  !
लोकतंत्र पर आच्छादित 
पल बढ़ रहे कई तंत्र 
पुलिस-तंत्र  प्रशासन-तंत्र   
मंत्री-तंत्र   मंत्री के सगे-संबंधी  तंत्र  
इस तंत्र में मंत्रमुग्ध -
तिरसठ साल से पड़ा लोकतंत्र  !

सुना है पुलिस तंत्र प्रसन्न है 
उनपर लक्ष्मी  मईया  कृपासन्न हैं 
प्रशासन शवासन में लेटा है 
इस तंत्र ने भी अच्छा समेटा है 


तंत्रों के तांते लगे हैं 
प्रधानी से संसद तक 
हर जगह नेताई के खांचे लगे हैं 
फिट होने की होड़ में संख्या बढती जाती है 
तंत्र बढा    नेता बढे
जनता सिमटी जाती है !!
      .........अरुण 
(वृहस्पतिवार ७ अप्रैल २०११)

Tuesday, April 5, 2011

भदेस

भारत हमारा देस है 
सर्वत्र स्वच्छंद परिवेश है 
सभी को समस्त सुविधाएं हैं 
सब फले फूले मोटाये हैं 
दुविधा  का दलदल है 
कहाँ कोई क्लेश है ?
भारत हमारा देस है 

कोई भी श्वान 
कभी भी कहीं भी कुछ भी 
भौंक सकता है !
बनाकर सड़क को नाला 
वराह जब चाहे जितना 
लोट सकता है !
उपलब्ध है चारागाह 
हर प्रकार के गर्दभों को !
राजकीय टिड्डी दल 
हमारे खेतों को खोंट सकता है !
सभी चीजों का सर्वत्र समावेश है 
भारत हमारा देस है.

भूखे भेड़ियों को 
व्यभिचार का चारा 
जन प्रतिनिधियों को 
नारों का नगाड़ा 
चुगने की - बजाने की 
पूर्ण स्वतन्त्रता है !
भिक्षुक जनसेवक भिक्षाटन में 
बाहुबली जन-त्राटन में 
तो बाबा जी वाचन में 
तन्मयता से व्यस्त हैं !

मेरे भाई यही तो सत्य है.
मत कहिये देस में भदेस है
इसी में रच बस जाइए 
यही अब अपने पूर्वजों का देस है
सर्वत्र स्वच्छंद परिवेश है.
भारत हमारा देस है !!

......अरुण
(सोमवार १३ जून २००३ )