Sunday, November 8, 2009

परिभाषा

बादल
बादल
अपने समस्त कुनबे समेट
घिरकर छा जाता है
पूरे क्षितिज पर
पैदा करता है दहशत
गरज कर बरस कर
पर कब तक ?
अस्तित्व ही मिट जाता है
एक बार के प्रदर्शन में ।

आकाश
आकाश
दम्भी
शौहर
पृथ्वी के सर पर सवार
बस नीले भूरे लाल पीले
रंग बदलता
सूरज की तपन बारिश ओले आंधी
रोक न पाता
अपनी बड़प्पन दिखाने को
क्षितिज में पसरा रहता
आलसी दम्भी आकाश .


..........अरुण
( मार्च २००७ )

1 comment:

  1. उमड़ - घुमड़ कर जब
    वो अपनी ही शान मै
    चलने लगता है !
    ज़मी वालो का दिल तो
    जोरो से धडकने लगता है !
    वो तो बस जीता है
    ओरों की चाह के लिए !
    फिर उसका प्रदर्शन ..............
    ओरों से बेहतेर क्यु न हो ?
    और उसके लिए हमारे दिल मै
    प्यारी सी जगह फिर क्यु न हो !

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